रामायण सम्बंधित श्रीलंका के स्थलों की एक रोमांचक यात्रा कथा लाग – २

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तिरुकेतीश्वरम मंदिर, मन्नार

रामायण सम्बंधित श्रीलंका के स्थलों की एक रोमांचक यात्रा कथा लाग – २

यह मंदिर मन्नार शहर से करीब १०कि.मी. दूर, मन्नार राजमार्ग पर स्थित है। यह श्रीलंका के तीन शिवलिंगों में से दूसरा शिवलिंग है। किवदंतियां कहतीं हैं कि इस मंदिर का निर्माण रावण के श्वसुर माया अथवा मायासुर ने किया था। वह एक कुशल वास्तुकार थे, जिन्होंने इन्द्रप्रस्थ के मायासभा का भी निर्माण किया था।

पुर्तगालियों द्वारा इसे नष्ट किये जाने के बाद, सन १९०० के शुरुआत में, मूल शिवलिंग की खुदाई के पश्चात, इसे पुनःस्थापित किया गया। नष्ट होने से पूर्व, इसे श्रीलंका स्थित सभी शिवमंदिरों में से विशालतम शिवमंदिर माना जाता था। कहा जाता है कि इस नष्ट किये गए शिवमंदिर के पत्थरों से ही मन्नार का किला, मन्नार के सभी गिरिजाघर और केट्स के हैमर्शील्ड किले का निर्माण किया गया था। आप इस तथ्य से अंदाजा लगा सकतें हैं कि मूल शिव मंदिर कितना विशाल रहा होगा!

इस मंदिर में कई सभामंडप थे जिनमें भगवान की विभिन्न मूर्तियाँ रखीं गईं थीं। इन सभामंडपों के प्रवेशद्वार पूर्णतः एक पंक्ति में बनाए गए थे। मैं पहले सभामंडप के प्रवेशद्वार से, सभी सभामंडपों के पार, मुख्य मंदिर में स्थित शिवलिंग को देख सकता था। इस अभूतपूर्व दृश्य को देख मन में एक अद्भुत शान्ति का अनुभव हुआ।

कोनेश्वरम कोविल

रामायण सम्बंधित श्रीलंका के स्थलों की एक रोमांचक यात्रा कथा लाग – २

त्रिंकोमाली स्थित कोनेश्वरम कोविल के दर्शन किये। यह, वह तीसरा व अंतिम शिवलिंग है जहां भगवान् राम ने ब्राम्हण हत्या दोष निवारण हेतु पूजा अर्चना की थी। इस मंदिर का निर्माण अगस्त्य मुनि ने किया था। इसे दक्षिण का कैलाश* भी कहा जाता है। इसके साथ साथ यह एक महाशक्ति पीठ भी है। यह मंदिर एक पहाड़ी के ऊपर बनाया गया है जहां से बंदरगाह का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है।
• श्रीलंका स्थित दक्षिण का कैलाश ठीक उसी देशांतर पर स्थित है जिस पर कैलाश पर्वत स्थित है।

दंतकथा

ऐसा कहा जाता है कि रावण की माता हर दिन शिवलिंग की पूजा किया करती थी। एक दिन उन्हें पूजा हेतु शिवलिंग नहीं मिला। उनकी पूजा सम्पूर्ण करने में मदद करने हेतु रावण ने दक्षिण कैलाश जा कर शिवलिंग प्राप्त करने हेतु घोर तपस्या की। भगवान् शिव के प्रकट ना होने पर रावण क्रोधित हो उठा और उसने दक्षिण कैलाश पर्वत को उठाने की चेष्टा की।परन्तु भगवान् शिव ने उसे पछाड़ दिया। उस पर भी रावण ने सीख नहीं ली और अपनी तलवार निकाल कर पर्वत पर एक बड़ा चीरा लगाया जिसे रावण चीरा कहते हैं। रावण की इस करनी पर दुखी होकर शिव ने उसे घोर सजा दी। रावण घबराकर भगवान् शिव को मनाने लगा। अपने सर व बाहों को वीणा बनाकर वह भगवान् की स्तुति गायन करने लगा। इससे प्रसन्न होकर शिव ने उसे क्षमा कर दिया व एक शिवलिंग उसे दिया।

प्राचीन कोनेश्वरम मंदिर

एक प्राचीन मंदिर के रूप में कोनेश्वर कोविल का उल्लेख रामायण व महाभारत दोनों महाकाव्यों में किया गया है। चोलवंशी राजाओं के संरंक्षण में इस मंदिर का शीघ्रता से विकास हुआ और यह एक विशाल गोपुरम और एक हज़ार स्तंभों का मंदिर बन गया। अपनी कीर्ति की चरम सीमा पर इसके परिसर ने पूरी पहाड़ी अपने अन्दर समा ली थी। जैसा कि कहा जाता है, प्रत्येक उत्थान के पश्चात पतन नियत होता है। सन १६२२ में पुर्तगालियों ने इसे नष्ट कर दिया था। खुदाई के पश्चात, भगवान् शिव, पार्वती और गणेश की मूर्तियों के खोज के उपरांत इस मंदिर का पुनःनिर्माण किया गया।

“ सन १९५६ में प्रसिद्ध लेखक आर्थर सी. क्लार्क ने गोताखोरी के दौरान इस स्वयम्भू लिंग को खोज निकाला जिसकी स्थापना कभी रावण ने की थी। “null

वर्त्तमान में पहाड़ी के निचले भाग पर सेना की एक टुकड़ी को रखा गया है जो ध्यानपूर्वक पर्यटकों का निरिक्षण करती है। मंदिर की ओर जाते मार्ग पर कई दुकानें थीं जो पूजा सामग्री, कपडे, खिलौने, खाद्यवस्तुयें इत्यादि बेच रहीं थीं।

इसके पूर्व दर्शन किये स्थलों की तरह, यहाँ भी लोगों ने मेरा स्वागत किया। सब अत्यंत आगत्यापूर्ण व मित्रवत थे और अपने घर भोजन ग्रहण करने हेतु आमंत्रण देने को आतुर थे। मैं सोच रहा था कि मेरे प्रति इनका इतना अच्छा व्यवहार उनके स्वयं के अच्छे स्वभाव के कारण था या मेरी किसी कथनी अथवा करनी ने उनका दिल जीत लिया था। जो भी हो, मुझे अपनी इस यात्रा में बहुत आनंद प्राप्त हो रहा था और शायद इसलिए मेरे मुख पर निरंतर मुस्कान बिखरी रहती थी। भरे हुए रास्ते पर, काम पर जाने की जल्दी में गाडी चलाने की झुंझलाहट से कोसों दूर, इस सुन्दर प्रदेश में इत्मीनान से मोटरसाईकल चलाने के आनंद ने मेरी सारी अच्छाईयां उभारकर सम्मुख प्रस्तुत कर दिया था।

सिगिरिया

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सिगिरिया का कोबरा हुड गुफा मेरा अगला पड़ाव था। दाम्बुला शहर से १५कि.मी. दूर यह एक विश्व विरासत स्थल है। दंतकथाएं कहतीं हैं कि सीता अपहरण के पश्चात, रावण को भय था कि भगवान् राम के शुभचिंतक या सहयोगी देवी सीता को ढूँढ लेंगे। इसलिए वह देवी सीता को इश्त्तिपुरा, सीता पोकुना, उसनगोडा, सीता कोटुवा और अशोक वाटिका जैसे अनेक स्थलों पर निरंतर विस्थापित करता रहा। सिगिरिया स्थित कोबरा हुड गुफा अर्थात् नाग शीर्ष सदृश गुफा भी ऐसा ही एक स्थल है जहाँ रावण ने सीता को कैद कर रखा था।

ट्रावेल ब्लोग्स- अनुराधा आगे तीसरे लाग का इन्तज़ार करें ओर कोमेन्ट ज़रूर करें


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